मंजिल कही होती है तो राहे ले जाती है कहीं

दर्पण के टुकड़े आगाज से अंजाम का अंदाजा लगता है नहीमंजिल कहीं होती है और राहें ले जाती हैं कहींख्वाहिशो के अंकुरित होने पे खुश क्या होईयेपौधा कभी बनती नही फल कभी लगते नहीवो आदतन ही मुस्कराता है तो क्या पता चलेकौन सी मुस्कान उसकी प्यार है कौन सी नहींअब ऐसे मेहरबां से... [पूरी पोस्ट]
writer Krishan lal "krishan"
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[01 Feb 2010 05:53 AM]

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