बेटियाँ

पूर्णिमा जब खुश होती हैं बेटियाँतो आँगन चहकने लगता है .रंगोली सजती है दरवाजे पर .सारा का सारा आसमानभर उठता है बन्दनवारों से .तुलसी रोज़ होती है एक हाथ लम्बी .नीम में पड़ते हैं झूले .आम के बौर में छिप करकूकती है कोयल .और चौक में बिखर - बिखर जाते हैंचम्पा - चमेली... [पूरी पोस्ट]
writer पूर्णिमा

कविता

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[28 Jan 2010 08:04 AM]

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