लड़कियाँ कविताएँ हैं
लड़कियाँ कविताएँ हैं ;चाहे - अचाहे आ जाती हैंमन के आँगन में .कभी हँसाती और गुदगुदाती हैं .कभी रूठ जाती हैं ,कभी रुलाती हैं .कविताओं को कुछ भी छिपाना नहीं आता .लड़कियाँ भी कहाँ कुछ छिपाना जानती हैं ?कविताएँ सहज हैं ,सच्ची हैं, सुंदर हैं .लड़कियाँ भी कितनी...
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पूर्णिमा
कविता
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[28 Jan 2010 08:00 AM]



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