लड़के

पूर्णिमा सपनों को सहेजते हैंअपनी आंखों मेंअपनी उम्र का हिसाब रखते हुए लड़के .खिलखिलाती हैं जब लड़कियाँ,अपनी मुस्कान को दबाते हैं लड़के.आईने के सामने घंटोंबतियाती हैं जब बहनें,कभी रीझकर तो कभी खीझकरमुक्का तानते हैं लड़के .और जब किसी दिनतिरछी चितवन सेदेख लेती है... [पूरी पोस्ट]
writer पूर्णिमा

कविता

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[28 Jan 2010 08:01 AM]

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