दिल तो बच्चा है जी

ख्वाहिशें ऐसी बीते सप्ताह के पंाच दिन कब गुजर गए, पता नहीं चला। जयपुर साहित्य उत्सव अंतरराष्ट्रीय पहचान बना चुका है। शुरूआती सालों के तीन-चार आयोजनों में स्थानीय प्रतिनिघित्व की उपेक्षा, शराबनोशी और अंग्रेजी वर्चस्व जैसी टिप्पणी करने वाले ज्यादातर लोग पस्त नजर आए।... [पूरी पोस्ट]
writer ramkumar singh
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[01 Feb 2010 04:18 AM]

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