इस अकेलेपन में भी मैं खिलखिलाना चाहती हूँ।
कौन है जो जिंदगी तनहा बिताना चाहता है,जिदगी को चुन लिया तनहाइयों नें किंतु मेरी,अब मुझे जैसी भी मिली, वैसी बिताना चाहती हूँ, इस अकेलेपन में भी मैं खिलखिलाना चाहती हूँ।छूट जाने के लिये ही मीत जब सारे मिले हैं,दिल जलाने के लिये ही दीप जब सारे जले हैं,क्यों...
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कंचन सिंह चौहान
गीत
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[01 Feb 2010 04:22 AM]



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