एक नागिन की दास्तां.....

मेरी आवाज़ घने जंगल में गहरे तरु की छाया मेंदुखियारी एक नागिन नें कुण्डली मारीअपने ही जायों को फ़ंसायाअनमने मन से खाया औरकोख से निकाल पेट में पायाखाते-खाते समझायाअरे क्यों आए दुनिया मेंदुनियादारी निभानेखुद शिकार बनने या बनानेनहीं जानते थे तुमहर कदम पर कांटे... [पूरी पोस्ट]
writer सीमा सचदेव
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[01 Feb 2010 04:14 AM]

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