थोड़ी चलने को जगह
लू को मैं समझ लेती हूँ ठँडी हवाथोड़ी चलने को जगह हो जायेशाम को मैं समझ लेती हूँ सुबहइसी टुकड़े पर सुबह की खेती करकेथोड़ा आसमाँ मेरे नाम हो जाये दीवारों से उलझूंगी तो चलूँगी कैसेसिर पर खड़ा सूरज सम्भालूँगी कैसेतपिश में थोडा आराम हो जायेउड़ जाती हैं धज्जियाँ...
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शारदा अरोरा
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[01 Feb 2010 02:15 AM]



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