नवगीत: चले श्वास-चौसर पर... ---संजीव 'सलिल'
*चले श्वास-चौसर पर...आसों का शकुनी नित दाँव.मौन रो रही कोयल,कागा हँसकर बोले काँव...*संबंधों को अनुबंधों नेबना दिया बाज़ार.प्रतिबंधों के धंधों के आगे दुनिया लाचार.कामनाओं ने भावनाओं को करा दिया नीलम.बद को अच्छा माने दुनिया कहे बुरा बदनाम.ठंडक देती धूपतप...
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आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
contemporary hindi poetry
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[31 Jan 2010 22:09 PM]



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