Kuchh kahi kuchh unkahi

Kuchh kahi kuchh unkahi जब भी मैंने अपनी अभिव्यक्ति को -शब्दों के जंगल में - निःशब्द घूमने के लिए छोड़ दिया है,मुझे एक ही एहसास हुआ है की मैं,एक बेजुबान आदमी - सिर्फ देख सकता , सुन सकता और,सूंघ सका हूँ......पर कह नहीं सकता कुछ भी।क्युंकी, शब्दों के जंगल में,सिर्फ और सिर्फ आदमखोर... [पूरी पोस्ट]
writer Nihar Khan
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[31 Jan 2010 20:52 PM]

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