गीत कोई कलम से झरा ही नहीं

गीत कलश प्रार्थना कर थकी छन्द की भूमिकामुक्तकों ने कई बार आवाज़ दीदोहे दस्तक लगाते रहे द्वार परसोरठे बन गये शब्द के सारथीचन्द चौपाईयाँ चहचहाती रहींगुनगुनाती रही एक गम की गज़लथे सवैये प्रतीक्षा सजाये खड़ेबँध गया लय में अतुकान्त भी एक पलभावना सिन्धु सूखा भरा ही... [पूरी पोस्ट]
writer राकेश खंडेलवाल
views
13
upvote
0
downvote
0
rating
0
comments
5
[31 Jan 2010 20:40 PM]

Free Vedic Astrology From Astrobix