गीत कोई कलम से झरा ही नहीं
प्रार्थना कर थकी छन्द की भूमिकामुक्तकों ने कई बार आवाज़ दीदोहे दस्तक लगाते रहे द्वार परसोरठे बन गये शब्द के सारथीचन्द चौपाईयाँ चहचहाती रहींगुनगुनाती रही एक गम की गज़लथे सवैये प्रतीक्षा सजाये खड़ेबँध गया लय में अतुकान्त भी एक पलभावना सिन्धु सूखा भरा ही...
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राकेश खंडेलवाल
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[31 Jan 2010 20:40 PM]



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