घुस पैठी थकान…
इतवार का बिहान सिर तक रजाई लिए तान घर में की खटपट से बन्द किए कान आंगन में धूप रही नाच छोटू ककहरा किताब रहा बाँच फिर भी न आलस पर आने दी आँच कुंजीपट खूँटी पर टांग धत् कुर्सी कर्मठता का स्वांग दफ़्तर में अनसुनी है छुट्टी की मांग कूड़े का ढेर...
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सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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[31 Jan 2010 07:55 AM]



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