तेरी कीमत बता गए

चेतना के स्वर उजाले की ओर हमें सोते हुए से वे कुछ यूँ जगा गए, फूलों ने दिए थे ज़ख्म वे उन पर नमक लगा गए कहते थे बहुत समझदार हैं छुटपन से,बस लाड प्यार में उनके जरा कदम डगमगा गए टूटा कईयों का झूठा यकीं तो कोई बात नहीं,मुझसे लिया था उधर देकर मुझी को दगा गए कहते थे जाने नहीं देंगे... [पूरी पोस्ट]
writer चेतना के स्वर

कविता

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[31 Jan 2010 04:53 AM]

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