त्रासदी

उधेड़-बुन जब खटखटाते थे द्वारकहते थे घर जाइए आपअब मरते हैं आजतो पूछते होकैसे हैं आप?हैटी की जनता कीयदि इतनी थी चिंतातो करते मददजब थे वो ज़िंदाजब कमा के खाने के लिएआते थे वोतरह-तरह के दाँव-पेंच निकाल केभगा दिए जाते थे वोमेहनत-मजूरी की कीमतपाई-पाई से नापते हो तुमऔर... [पूरी पोस्ट]
writer Rahul Upadhyaya

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[30 Jan 2010 23:35 PM]

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