ओ रे बचपन!

मानसी ओ रे बचपन जीवन के संगक्यों कट्टी मिट्ठी करता हैबूढ़ी कबड्डीचक्कर घिन्नीअक्कड़ बक्कड़बम्बई दिल्लीपुलिस पकड़तीअंडा चोरीमां से लड़करडंडा गिल्लीओ रे बचपन छूट गया मन तेरी कुटिया कहीं पड़ा हैछ: बारातीदो की शादीचांद की नगरीकी शहज़ादीबाँहों की डोलीमें चढ़ करमैके से मैके... [पूरी पोस्ट]
writer मानसी

poetry

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[30 Jan 2010 22:53 PM]

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