यहां कहां सृजन
हो रही तब्दील पत्थर में,जिसमें न स्पन्दन है,और न सृजन!चिडिय़ों की चहचहाहटसी किलकारी भीपड़ोस के पेड़ों तक सीमित,सूना मेरा आंगन!चरम पर हैफूट कर बहने की चाहतसहूं असीम पीड़ा का सुखगंूजे उसका रुदन!कपोल फूटने का स्वप्न लिएझुकती हैं आंखें,पर वहां फिर न सृजनन...
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chetna
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[30 Jan 2010 06:25 AM]



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