यूँ नींद से वो जान-ए-चमन जाग उठी है,....
मेरे मित्र आशीष से पहली पंक्ति उधर लेते हुए चार पंक्तियाँ लिख रहा हूँ ....यूँ नींद से वो जान-ए-चमन जाग उठी हैइसी क़यामत का था कब से इंतज़ार मुझकोवो जन्नतें और होंगी मिटते हैं जिसके लिए काफ़िरइस चमन के कांटे भी मंजूर बार बार मुझको...
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राकेश
कविता
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[30 Jan 2010 05:22 AM]



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