अरे, पेपर नहीं आया!

मंतव्य सुबह 6.30 को उठ जाता हूँ. फिर भूत की तरह टहलने लगता हूँ. इंतजार पेपर (पढें समाचार पत्र) का होता है. फेरिया आया कि नहीं. नहीं आएगा तो मुश्किल होगी. शौच के लिए कैसे जाया जाएगा. बार बार दरवाजे तक जाता हूँ, फिर मायूस होकर लौट आता हूँ. एक आँख घड़ी पर होती है,... [पूरी पोस्ट]
writer पंकज बेंगाणी

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[30 Jan 2010 01:02 AM]

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