मिट्टी मेरी....(एक कविता)
किसी का भी दुःख मै नहीं बाँट सकता हूँ,किसी की भी राहों से कांटे मै नहीं छाँट सकता हूँ,पता नहीं कैसी मिट्टी है मेरी!जो मुझे जैसा समझता है मै वैसा ही हूँ मै,जो खुद को जैसा भी समझता है वैसा भी हूँ मै,पता नहीं कैसी मिट्टी है मेरी!ऐसे तो हाड़-मांस कि ही हूँ...
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kunwarji's
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[30 Jan 2010 03:22 AM]



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