विरोध ही बदलाव का मूल है...
अजीत कुमारव्यावसायिक सिनेमा और मीडिया, पापुलर कल्चर की वह सबसे पापुलर विधा है जिससे आप विचार या विरोध् के बुनाव या विस्तार की उम्मीद नहीं कर सकते। उल्टे खंडित सच के नाम पर यह विरोध्, संगठन, जनपक्षधरता और आंदोलन का लगातार माखौल उडाने में लगा है। आज की...
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संदीप पाण्डेय
अजीत की कलम
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[30 Jan 2010 03:21 AM]



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