बेटी

feminist poems उसके होने से हीपावन है घर-आँगन,उसकी चंचल चितवनमोह लेती हम सबका मन,वो रूठतीतो रुक जाते हैंघर के काम सभी,वो हँसतीतो झर उठते हैंहरसिंगार के फूल,महक उठता हैघर का कोना-कोना,जाने कैसे हैं वे लोगजो बेटियों कोजन्मने ही नहीं देतेहम तो सह नहीं सकतेअपनी... [पूरी पोस्ट]
writer mukti

कविता

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[29 Jan 2010 17:34 PM]

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