आँखों भर आकाश है बाहों भर संसार...
मैं रोया परदेस में भीगा माँ का प्यार दुख ने दुख से बात की बिन चिठ्ठी बिन तार छोटा करके देखिये जीवन का विस्तार आँखों भर आकाश है बाहों भर संसारलेके तन के नाप को घूमे बस्ती गाँव हर चादर के घेर से बाहर निकले पाँव सबकी पूजा एक सी अलग-अलग हर रीत मस्जिद जाये...
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रामकृष्ण गौतम
ग़ज़ल
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[29 Jan 2010 12:44 PM]



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