आज है इकतालिसवाँ दिन!.....................घुघूती बासूती
कबसे मन गा रहा था....वो सुबह कभी तो आएगीजब प्लास्टर उतारा जाएगाजब बाँह को धोया जाएगा।चालीस दिन से हर रात दिनों की गिनती करते बीती है। कितने बीत गए, कितने बचे हैं। एक बाँह को ऊपर से आठ अंगुल और नीचे से केवल उँगलियाँ छोड़कर यदि प्लास्टर में जकड़ दिया गया हो...
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Mired Mirage
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[29 Jan 2010 11:55 AM]



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