यारब! ज़माना मुझ को मिटाता है किस लिये
दाइ म [1] पड़ा हुआ तेरे दर पर नहीं हूँ मैंख़ाक ऐसी ज़िन्दगी पे के पत्थर नहीं हूँ मैंक्यूँ गर्दिश-ए-मुदाम[2] से घबरा न जाये दिलइन्सान हूँ, पियाला-ओ-साग़र[3] नहीं हूँ मैंयारब! ज़माना मुझ को मिटाता है किस लियेलौह-ए-जहाँ[4] पे हर्फ़-ए-मुकर्रर[5] नहीं हूँ...
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Pankaj Parashar
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[29 Jan 2010 07:02 AM]



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