मेरे क़त्ल की साजिश, वही, रचते रहे है रात भर
किसके लिए और किसलिए रोये हम रात रात भरतुम रही खामोश या तेरी कही किसी बात पर बन के बदली तुम बरस जाती तो करते शुक्रियावैसे गुजारिश के सिवा मेरा बस कहाँ किसी बात परज़िन्दगी भर ही हसीनो ने हमें धोखा दियातुम्ही कहो कैसे भरोसा अब कर लूँ औरत जात परकोशिश भी की...
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Krishan lal "krishan"
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[29 Jan 2010 04:00 AM]



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