स्वलक्षण-शील
’महाजनो येन गतः..’ वाला मार्गभरी भीड़ वाला मार्ग हैनहीं रुचता मुझे, जानता हूँ यह रीति-लीक-पिटवईयों की निगाह में निषिद्ध है, अशुद्ध है ।चिन्ता क्या ! मेरी इस रुचि में (या अरुचि में)बाह्य और आभ्यन्तर,प्रेरणा और व्यापार की साधु-मैत्री है...
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हिमांशु । Himanshu
कविता
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[28 Jan 2010 21:50 PM]



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