वसन्त का कोई शीर्षक नहीं
सुन रहा हूँ कि वसन्त आ गया है! आज कुछ यूँ ही लिख दिया है कविता की तरह..इस यकीन के साथ कि यदि निज व निकट के जीवन प्रसंगों में कहीं नहीं दिखता है वसन्त तो कविता में , और सिर्फ कविता में वह तो है मात्र एक स्वप्न ..एक क्षतिपूर्ति..शीत से सिहरे दिनों में...
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sidheshwer
कविता
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[28 Jan 2010 19:26 PM]



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