होली

दर्पण होलीअब तो मोहन तुम बिन, कुछ नहीं सुहाता,होली ही नहीं कोई, उत्सव नहीं भाता,आतंकी ख़ून की होली, रोज़ ही खेलें,बेगुनाह लोगों की, जां ही ले लें,सरकार मूक होकर, तमाशा देखती है, हत्याओं पर लगाम लगे, ये न सोचती है,बिगड़ा रईस अबला के साथ, होली मनाता है,गंगा मैली... [पूरी पोस्ट]
writer SURINDER RATTI

होली

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[11 Mar 2009 03:44 AM]

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