हिंसा

दर्पण हिंसा वफ़ा-जफ़ा की बातें दोहरायी गयी,नज़रें लाल सुर्ख फिर लड़ायी गयीक़यामत को बुलाने का इरादा है उनका,जिस्मों पे ज़ोर से तलवार लहरायी गयी वो क्या जानें लहू बेशकीमती है,बहा दी नदियाँ साँसें रूकवायी गयी लाशों की सेज पे चले हंस्ते हुए,गली-गली खुशीयाँ मनायी गयी... [पूरी पोस्ट]
writer SURINDER RATTI

कविता

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[18 Jul 2009 08:58 AM]

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