एक सच

दर्पण एक सच क्षण में जनम हो रहाऔर विलय भी हो रहाआस-निरास पर टिकाये जीवन भी रो रहाआम के बदले तू धरा मेंक्यों बबूल बो रहापीड़ा से भरे मन कोआंसुओं से धो रहाकुंभकरण की भांति मनुष्य है आज भी सो रहाबहुमूल्य सभ्यता,प्रथा,संस्कृति भी खो रहा ........ [पूरी पोस्ट]
writer SURINDER RATTI

कविता

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[19 Jul 2009 10:34 AM]

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