रूठना

दर्पण रूठना ज़िन्दगी तूने तो फक़त रूठना ही सीखा,मेरे चैन को पल-पल लूटना ही सीखा दिल तो नाज़ुक है शीशे  की तरह से, तल्ख़ ज़ुबां का असर टूटना ही सीखामेरी गुस्ताखीयों को तौले वो तराज़ू में,सवाब के  पलड़े ने न झूकना ही सीखाकाली रात ने डराया नींद... [पूरी पोस्ट]
writer SURINDER RATTI

नज़्म

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[03 Oct 2009 02:57 AM]

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