माहताब

दर्पण माहताब आज  चले  हैं वो फिर,  गुलशन को   मेहकानें,     बहारों का इस्तक़बाल करो, और छेड़ो तरानेहम  उनकी अदाओं   को   देख,  दंग रह गये, क्या नज़ारा  था,... [पूरी पोस्ट]
writer SURINDER RATTI

नज़्म

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[20 Jan 2010 06:49 AM]

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