अब सोचता हूं
तुमने मुझे देखाकुछ इस तरहकि मंत्रमु्ग्ध मैं दौडकर पहुंच गयातुम्हारे पासवर्जनाओं की लौह दीवारलंघकरक्षितिज के उस पारतस्वीर की सारी रेखाएंजहां आधी अधूरी हैंअपूर्ण हैंअब सोचता हूं अपूर्णता ही पूर्णता है क्या...
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pankaj mishra
कविता
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[28 Jan 2010 05:54 AM]



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