पथभ्रष्ट कबूतरों की चोंच में दबे रह गए खत
जीन-बुशर्ट पहने लड़के-लड़कियां / जब-जब खटखटाते की-पैड / स्क्रीन पर उभरते कुछ हर्फ / 160 कैरेक्टर्स से / क्या बुनते थे वो / नहीं समझ पाया / मैं / जब तक नहीं आया था / तुम्हारा / एक औपचारिक लघु-संदेश / सुबह का सलाम पल्लू में बांधकर / अब जानता हूं / तकनीक के...
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चण्डीदत्त शुक्ल
कह रहा हूं तुमसे
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[28 Jan 2010 04:38 AM]



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