गुल्लक

रजनीगन्धा लम्हे, गुल्लक मेंरेज़गारी से खनकते हैंहर दिन रुई से भरी दोहड़के लिए ललकते हैं।एक लम्हा,जब आँखें उस पर टिक जाती हैं,लाल, पीले फूलों वाली,किस, किस पगडंडी से गुज़रती है,ठिठुरन में जलते अलावों सीधूप की सगी बहन लगती है,मुलायम सी रेशमी तारों कीदेवों के दुशाले सी... [पूरी पोस्ट]
writer रजनी भार्गव
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[27 Jan 2010 22:12 PM]

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