बारिश में भींगती शाम
भरी दोपहर में घर लौटकरदेखाकि तुम कहीं औरमुझसे दूर, बहुत दूरबारिश में भींगती शाम लग रही होमैंने अक्सर सोंचा हैकि तुम बारिश में भींगती शाम हीं होया उसके लिएमेराभरी दोपहरी में होना जरूरी हैऔर तबमेरी आँखें मुस्का गयी हैं ये जान कर किदरअसल मेरी सोंच हीं...
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ओम आर्य
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[27 Jan 2010 21:33 PM]



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