लाँघ पाऊँ बाधाओं को!!

शिल्पकार के मुख से मरीचिकामृगतृष्णाअतृप्त चक्षुअतृप्त आत्मामन चातकव्याकुल अनवरतजीवन दुर्भरकांक्रीट की दीवारेंटूटती नहींबाधाएं लाँघ नहीं पायाअग्नि ज्वालायें धधकती सीने मेंपुन: उर्जानिर्मित करनेपुन: कोशिश करूँलाँघ पाऊँ बाधाओं कोतृप्ति तभी संभव है.आपकाशिल्पकार... [पूरी पोस्ट]
writer ललित शर्मा

कविता

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[27 Jan 2010 19:48 PM]

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