हाशिया...!
याद है ना!एक हाशिया होता था!इसके उस पार लिखा तोकट जाते थे नंबरइम्तेहान में !एहतियात के लिएहर कोईकॉपी मिलते ही ,हर पन्ने परखींच देता था हाशिया !और फिर शुरू करता थालिखना |लेकिन ये तो आदत सी ही पड़ गई !हाँ !ज़िन्दगी एक किताब है !मानता हूँ मैं,और ये भीकि जीवन...
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निपुण पाण्डेय
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[27 Jan 2010 10:53 AM]



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