हे भाग्य विधाता !!
लोकतंत्र यदि मानव होता ,चीख चीख रोता चिल्लाता ।अब कितना अपमान सहुंगा ,बतलाओ हे भाग्य विधाता ॥है स्वतंत्र गणतंत्र राष्ट्र पर , क्या सब जन स्वतंत्र अभी हैं ?जो निर्धन ,निर्बल, दुर्बल हैं ,वो सारे परतंत्र अभी हैं ॥जिसके हाथ में मोटी लाठी , भैंस हांक कर...
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अजय कुमार
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[27 Jan 2010 03:08 AM]



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