दो- दो कुलों की लाज को ढोती हैं बेटियाँ
कल (२६ जनवरी २०१०) पुरानी फाइलों में दबी एक चीज़ मिली लैमिनेटेड की हुई. वह कोई प्रमाणपत्र या रसीद नहीं थी बल्कि एक कविता थी. ज़ोर देने पर याद आया कि जब मैं प्लस चैनल के जुहू तारा रोड वाले ऑफिस में काम करता था तब वह मुझे एक फिल्म वितरक मित्र राणा साहब ने...
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विजयशंकर चतुर्वेदी
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[27 Jan 2010 00:59 AM]



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