“तब और अब” (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

शब्दों का दंगल (श्रीमती रजनी माहर) तब ऱुपये किलो था आटा, अब है कितना घाटा, नानी संग जाती बाजार, नौ रुपये किलो था अनार, एक रुपये में दो किलो ज्वार, गेहूँ चावल की भरमार, कम मिलती थी बहुत पगार, कभी न होते थे बीमार, तन चुस्त थे मन दुरुस्त थे, थोड़े में सब लोग मस्त थे,... [पूरी पोस्ट]
writer डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक

अकविता

views
24
upvote
2
downvote
0
rating
2
comments
7
[26 Jan 2010 03:15 AM]

Free Vedic Astrology From Astrobix