कोई जा के रूठे हुए को मनाए, उमीदों के दीपक सहर ने जलाए । तरही मुशायरे के सप्ताह के प्रथम खंड में आज सुनिये अर्चना तिवारी जी और सुलभ सतरंगी को ।
गणतंत्र दिवस की सभी को शुभकामनाएं और बरसों पहले किसी कार्यक्रम के लिये लिखी हुई ये कविता आज भारत के संविधान को समर्पित आज़ाद जहां तन है और मन स्वतंत्र है ये जन का है ये मन का है ये गण का तंत्र है जनता का है जनता के ही द्वारा रचा गया जनता के लिये संविधान...
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पंकज सुबीर
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[25 Jan 2010 21:45 PM]



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