कवि हरिभजन सिंह की कविताएं

 Kala Sampada Evam Vaichariki दीवार: कहीं कोई दीवार उभर रही है चुपचाप, अचेत, अदृश्य देह को सहला-सहला जाती पौष-माघ की धूप जितना भी खटका नहीं उसका दबे पाँव चली आती मौत जितना भी सन्देह नहीं उस पर लेकिन कोई दीवार उभर रही है ज़रूर…. -अनुवाद: मनजीत कौर भाटिया दीवार कहीं कोई दीवार उभर... [पूरी पोस्ट]
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कविताएंअनुवाद: मनजीत कौर भाटियाकवि हरिभजन सिंहकविता में लड़की

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[20 Dec 2009 05:05 AM]

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