कवि हरिभजन सिंह की कविताएं
-अनुवाद: गगन गिल
अँधेरी रात में जिस हाथ ने
सुलगता जिस्म तुम्हारा छू लिया है
वही हाथ सुलगता है
अग्नि के कुंड में से जो चुल्लू
भरा था आचमन के लिए मैंने
न उसे अचव ही सका
न उसे गिरा ही सका
पहली बार मेरे जिस्म की सारी दरारें
बेबस लगती हैं
कोई जल है
जो टपकता...
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admin
कविताएंअकेली पीठअनुवाद: गगन गिलकंजका
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[28 Dec 2009 09:21 AM]



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