पुनश्च
सो गयी प्रतीक्षा थक कर तब गुनगुनाते तुम आयेझुलस बिखर गए आस सुमन तब बदरी बन तुम छायेयह महज संयोग नहीं प्रिय, हूँ सदियों से शापित मैंचाह जिस यज्ञ से कुछ पाना बन शर्मिष्ठा हुई अर्पित मैं...
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chetna
prateeksha
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[27 Dec 2009 05:53 AM]



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