जनाब सरवर की ग़ज़ल 08
ग़ज़ल ०८ आ भी जा कि इस दिल की शाम होने वाली है दिन तो ढल गया ज्यों त्यों, रात अब सवाली है ! इक निगाह के बदले जान बेच डाली है इश्क़ करने वालों की हर अदा निराली है ! हर्फ़-ए-आरज़ू लब पर आए भी तो क्या आए नाबकार यह दुनिया किसकी सुनने वाली है ? कोई क्या करे तकिया...
[पूरी पोस्ट]
आनन्द पाठक
ग़ज़ल
13
0
0
0
3
[25 Jan 2010 10:18 AM]



Shuffle








