जनाब सरवर की ग़ज़ल 08

उर्दू से हिंदी ग़ज़ल ०८ आ भी जा कि इस दिल की शाम होने वाली है दिन तो ढल गया ज्यों त्यों, रात अब सवाली है ! इक निगाह के बदले जान बेच डाली है इश्क़ करने वालों की हर अदा निराली है ! हर्फ़-ए-आरज़ू लब पर आए भी तो क्या आए नाबकार यह दुनिया किसकी सुनने वाली है ? कोई क्या करे तकिया... [पूरी पोस्ट]
writer आनन्द पाठक

ग़ज़ल

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[25 Jan 2010 10:18 AM]

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