रिश्ता

अनहद नाद अनामिका की एक कविता रिश्ता वह बिलकुल अनजान थी ! मेरा उससे रिश्ता बस इतना था कि हम एक पंसारी के ग्राहक थे नए मुहल्ले में । वह मेरे पहले से बैठी थी टॉफ़ी के मर्तबान से टिककर स्टूल के राजसिंहासन पर । मुझसे भी ज्यादा थकी दीखती थी वह फिर भी वह हँसी ! उस हँसी... [पूरी पोस्ट]
writer PRIYANKAR

अनामिकाकविताएं/poems

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[25 Jan 2010 08:17 AM]

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