ठंडी हथेली में मुस्कान की गुनगुनाहट
कलबहुत अरसे बादजब राह में धुंध गहरी हो रही थीऔर-और ज़्यादातब यकायकगाढ़ी राततब्दील हो गई ताज़ा सुबह में तुम फुसफुसाईंपागल हो?समझते ही नहींमैं तुमसे प्यार करती हूंठहर गई सांसथर्रा गया मैंपूरा का पूराअपने वज़ूद के साथ...तुम्हारी घृणातेज़ाब...
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चण्डीदत्त शुक्ल
कह रहा हूं तुमसे
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[25 Jan 2010 05:42 AM]



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