पत्रों का सिलसिला चलता रहे...
आजकल कविता वर्मा जी चिट्ठियों पर मेहरबान हैं. तभी तो उनके ब्लॉग kase kahun? पर चिट्ठी से जुडी यादें रोज ताजा हो रही हैं. उनकी चिट्ठियों में रिश्तों की सोंधी खुशबू है, जो भीना-भीना अहसास दे जाती है. अब कविता जी की चिट्ठियाँ डाकिया बाबू नहीं बांचे तो भला...
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डाकिया बाबू
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[25 Jan 2010 05:03 AM]



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