मौन की समिधा
हैं दिशाएं चुप की बस अब मौन की समिधा जलेगी,मनुष्य के अंतःकरण में समय की दुविधा पलेगी,ज़िन्दगी का अर्थ कोई जान पाया है कहाँ तक,ज़िन्दगी ही ज़िन्दगी को ज़िन्दगी बन कर छलेगी ।जल रहे हैं सभ्यता के गरिमामयी अवशेष सारे,टूट कर गिरने लगे हैं संस्कृति के पुंज...
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Nihar Khan
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[25 Jan 2010 03:41 AM]



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